
कुछ बातें ऐसी होती है जिनको हम सिर्फ़ और सिर्फ ख़ुद से करना पसंद करते है... इन बातों को कितना भी कुछ क्यों न लिख लें... पर लिख नहीं पते है क्युकि इनके लिए शब्द ही नहीं मिलते... कितना भी कुछ क्यों न कह लें... पर ऐसा लगता है कुछ कहना आता ही नहीं... खासकर जब हम एकांत में बैठे हो .. और ख़ासकर जब रात का समां हो... तारो की जगमगाहट के आगोश में हो... ऐसी बातें, जो हमने शायद कभी अपने सबसे अच्छे दोस्त या साथी से भी नहीं कही हो... वो बातें जो हमारे मन की डायरी के किसी पन्ने के कोने में लिखी रह गई हो और उन पर बातों पर नज़र ही नहीं गई हो... और कभी इन बातों को कहने का मौका ही न मिला हो... ये वो जगह है जहाँ सिर्फ आप बोलते है और सिर्फ आप ही सुनते है.. अक्सर ये बाते कमरे की छत पर लगे पंखे को देखते हुए कही और सुनी जाती है और ठण्ड के दिनों में तो रजाई के भीतर ही चुपके कह दी जाती है.... जहाँ आँखों तो बंद होती है, पर मन ही मन में बातो का सिलसिला चलता ही रहता है... जो बातें होती है न रातों में, ये वो बातें होते है जो आप या तो किसी से कह नहीं पाते या फिर, जो कहने की तमन्ना रखते है पर सुनने वाला कोई नहीं होता।
ऐसी मन ही मन में होने वाली बातें आधे से ज़्यादा तो "शायद/काश/अगर/मगर" जैसे शब्द के मायाजाल में ही फंसी रहती... "शायद/काश/अगर/मगर" - ये शब्द भी अजीब लगते हैं न... ये बातें हमेशा ऐसे शुरू होती है कि "काश ऐसा होता तो कैसा होता.. ऐसा होता तो जिंदगी में कितना सुकून होता... हम कितने खुश होते...." एक तरह से कहे तो सब "खयाली पुलाव" की ही तरह होती है ये बातें... पर फिर भी ख़ुद से बात करने वाले लोगो की दुनिया अपने आप में बहुत रंगीली होती है.... इस दुनियाँ में सवाल भी आप ही करते है और जवाब भी आप ही देते है.... और ये जवाब भी आप ही के मनपसंद के अनुसार होते है... लेकिन ये सब बातें कही न कही आ के "शायद/काश/अगर/मगर" जैसे शब्दों में मायाजाल से निकल ही नहीं पाती है... ।
नोट: ये सब बाते काल्पनिक है जिसका किसी के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है ... हो सकता है कि यह पोस्ट नींद की बड़बड़ाहट में की गई हो । ;)